ऐ ज़िन्दगी , तू ही बता ,
क्या कसूर है मेरा ?
हर कोई समझता ,
मैं हूँ नाकारा |

सब कुछ करती मैं ,
फिर भी बुरी बनती मैं |
हार गयी मैं सब कुछ करके ,
अब नहीं मेरे कुछ बस में |

जी लिया जितना था जीना ,
सबकी ख़ातिर , सबके लिए |
अब तो खुद से वादा है ,
जिऊँगी सिर्फ अपने लिए |

खुद में भर ली इतनी हिम्मत ,
तोड़ दूँगी हर झूठी ताक़त |
जिस जिस ने मुझे समझा नाकारा ,
उन्हें दिखाऊँगी मेरा सितारा |

अब न देखूँगी पीछे मुड़कर ,
छोड़ दिया सब कुछ पीछे |
नई राहों पर बढ़ चली हूँ ,
अपने सपनों को सींचे |

जो समझते थे मुझे नाकारा ,
एक दिन वहीं मान करेंगे |
मेरे हौंसलों की उड़ान देखकर ,
मेरी सफलता का गुणगान करेंगे |